वॉशिंगटन: खगोलविदों ने सौर मंडल से करीब 25 प्रकाश-वर्ष दूर पृथ्वी जैसा एक नया एक्सोप्लैनेट खोजा है। नासा के मुताबिक, GJ 3378b संभवतः चट्टानी ग्रह है और अपने तारे के हैबिटेबल जोन यानी उस इलाके में घूमता है, जहां परिस्थितियां सही होने पर सतह पर तरल पानी मौजूद रह सकता है।इस ग्रह का कम-से-कम द्रव्यमान पृथ्वी से दोगुने से थोड़ा ज्यादा है। इसे अपने तारे से पृथ्वी को सूर्य से मिलने वाली रोशनी का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा मिलता है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक GJ 3378b को पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश के लिए एक दिलचस्प लक्ष्य मान रहे हैं। ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल’ में प्रकाशित इस खोज से यह संकेत मिलता है कि सूर्य के आसपास रहने लायक ग्रह शायद पहले लगाए गए अनुमानों से ज्यादा आम हो सकते हैं। 25 प्रकाश-वर्ष की दूरी सुनने में बहुत बड़ी लगती है। लेकिन हमारी आकाशगंगा मिल्की वे करीब 100,000 प्रकाश-वर्ष चौड़ी है। इस पैमाने पर देखें तो GJ 3378b हमारे कॉस्मिक पड़ोस में ही मौजूद है।
GJ 3378b की खोज कैसे हुई?
रिसर्च टीम का नेतृत्व करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन में एस्ट्रोनॉमी के एसोसिएट प्रोफेसर पॉल रॉबर्टसन ने इसे हमारे सबसे नजदीकी कॉस्मिक पड़ोसियों में से एक बताया है।
हालांकि GJ 3378b और उसका तारा इतने दूर हैं कि उन्हें किसी बड़े बैकयार्ड टेलीस्कोप से सीधे देख पाना संभव नहीं है। दोनों उत्तरी तारामंडल कैमेलोपार्डालिस की दिशा में मौजूद हैं।
GJ 3378b जिस तारे की परिक्रमा करता है, वह एक रेड ड्वार्फ है। ये तारे सूर्य की तुलना में छोटे, ठंडे और कम चमकीले होते हैं। लेकिन इनकी संख्या बहुत ज्यादा है। अनुमान के मुताबिक, रेड ड्वार्फ हमारी आकाशगंगा के करीब 70 प्रतिशत तारों का हिस्सा हैं।
इसी वजह से जीवन की तलाश में इन तारों के आसपास मौजूद ग्रहों पर वैज्ञानिकों की खास नजर रहती है।
लेकिन एक समस्या भी है। रेड ड्वार्फ छोटे और धुंधले होते हैं, इसलिए उनके आसपास घूम रहे छोटे ग्रहों को पहचानना आसान नहीं होता।
GJ 3378b को खोजने के लिए खगोलविदों ने रेडियल वेलोसिटी मेथड का इस्तेमाल किया।
इस तरीके में वैज्ञानिक ग्रह को सीधे देखने के बजाय उसके तारे की गति में आने वाले बेहद छोटे बदलाव को पकड़ते हैं। जब कोई ग्रह अपने तारे की परिक्रमा करता है, तो उसका गुरुत्वाकर्षण तारे को भी बहुत हल्का-सा खींचता है। इससे तारे में एक छोटा-सा ‘वॉबल’ पैदा होता है।
टेलीस्कोप इस बदलाव को माप सकते हैं। इसी जानकारी से वैज्ञानिक ग्रह के द्रव्यमान और उसकी कक्षा के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। और ‘पानी के पीछे चलो’ की खोज
GJ 3378b अपने तारे के हैबिटेबल जोन में है। इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिकों ने वहां पानी या जीवन खोज लिया है। इसका सिर्फ इतना मतलब है कि ग्रह को अपने तारे से इतनी ऊर्जा मिल सकती है कि सही परिस्थितियों में उसकी सतह पर तरल पानी मौजूद रह सके।
और यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
किसी ग्रह का हैबिटेबल जोन में होना अपने आप में जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए ग्रह के पास सही वातावरण और ऐसी सतही परिस्थितियां भी होनी चाहिए, जो लंबे समय तक पानी को तरल अवस्था में बनाए रख सकें।
GJ 3378b के मामले में अभी यह साफ नहीं है कि उसकी सतह पर ऐसा स्थिर वातावरण मौजूद है या नहीं।
ग्रह एक ऐसी सीमा के करीब भी है जिसे खगोलविद कॉस्मिक शोरलाइन कहते हैं। इस क्षेत्र में तारे से आने वाला तेज रेडिएशन धीरे-धीरे किसी ग्रह के वातावरण को खत्म कर सकता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, अरबों साल पहले मंगल के साथ भी कुछ ऐसा हुआ हो सकता है। मंगल के पास कभी ज्यादा घना वातावरण और सतह पर पानी होने के संकेत मिलते हैं, लेकिन समय के साथ उसका वातावरण काफी कमजोर हो गया।
यही वजह है कि GJ 3378b की कहानी सिर्फ इस बात पर खत्म नहीं होती कि वह हैबिटेबल जोन में है।
आगे वैज्ञानिक क्या तलाशेंगे?
अब अगला कदम इस ग्रह के वातावरण को समझना होगा। इसके लिए पहले से ज्यादा शक्तिशाली और संवेदनशील स्पेस टेलीस्कोप की जरूरत होगी, जो ग्रह के वातावरण से गुजरने वाली या उससे परावर्तित होने वाली रोशनी का अध्ययन कर सकें।
अगर भविष्य की जांच में GJ 3378b के आसपास ऐसा वातावरण मिलता है, जो ग्रह की सतह पर स्थिर परिस्थितियां बनाए रख सकता है, तो इसकी अहमियत और बढ़ जाएगी।
तब वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि वहां पानी मौजूद है या नहीं और वातावरण में ऐसे रासायनिक संकेत हैं या नहीं, जो जीवन की संभावना के बारे में कुछ बता सकें।
फिलहाल GJ 3378b पर जीवन मिलने की कोई पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन पृथ्वी के अपेक्षाकृत नजदीक, संभावित रूप से चट्टानी और हैबिटेबल जोन में मौजूद यह ग्रह भविष्य की उन खोजों के लिए एक मजबूत उम्मीदवार बन सकता है, जिनका सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पृथ्वी के बाहर भी जीवन है?



