मुख्य सामग्री पर जाएँ

साल 1971 में चांद से मिले हरे कांच के दानों ने खोला Moon Water का राज

Written by: 
Published:
6 Min read

संपादकीय समीक्षा

यह लेख MystiSci की संपादकीय प्रक्रिया और नीतियों के अनुसार जाँचा गया है। हमारी टीम ने इस लेख की विश्वसनीयता के लिए इन मानकों का पालन किया है:

  • सत्यापित तथ्य (Fact-checked)
  • वैज्ञानिक समीक्षा (Scientific Review)
  • विश्वसनीय स्रोत (Trusted Sources)
  • प्रूफरीड और सटीक (Proofread)
MystiSci को बनाएं
पर पसंदीदा सोर्स
चांद के प्राचीन ज्वालामुखी कांच में पानी के संकेत और चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से का दृश्य
चांद के प्राचीन ज्वालामुखी कांच में पानी के संकेत और चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से का दृश्य
लेख सुनेंAI VOICE
हिंदी ऑडियो
00:00

चांद को लंबे समय तक एक बेहद सूखी जगह माना जाता रहा। लेकिन 1971 में अपोलो 15 के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा चांद से लाए गए हरे रंग के छोटे-छोटे कांच के दानों ने इस तस्वीर को बदल दिया। करीब 37 साल बाद वैज्ञानिकों ने इन दानों में हाइड्रोजन के संकेत पाए, जिससे पता चला कि चांद के अंदर कभी पानी मौजूद था और उसका कुछ हिस्सा आज भी वहां बचा हुआ हो सकता है।

वॉशिंगटन: साल 1971 में अपोलो 15 के अंतरिक्ष यात्रियों डेविड स्कॉट और जेम्स इरविन ने चांद की धूल भरी, ग्रे सतह पर कुछ अजीब चीज देखी। वहां छोटे-छोटे हरे रंग के कण बिखरे हुए थे। अंतरिक्ष यात्रियों ने इन कणों के नमूने इकट्ठा किए और उन्हें पृथ्वी पर ले आए। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये बेहद छोटे दाने दशकों बाद चांद के बारे में वैज्ञानिकों की एक पुरानी धारणा को चुनौती देंगे।ब्राउन यूनिवर्सिटी के अनुसार, ये हरे कण साधारण चट्टान के टुकड़े नहीं थे। ये ज्वालामुखी से निकले कांच के दाने थे। करीब 37 साल बाद, 2008 में वैज्ञानिकों ने इन्हीं दानों में पानी से जुड़े हाइड्रोजन के संकेत पाए। इस खोज ने एक अहम बात सामने रखी—चांद का अंदरूनी हिस्सा उतना सूखा नहीं था, जितना वैज्ञानिक लंबे समय से मानते आए थे।

एक अजीब खोज!

अपोलो 15 जुलाई 1971 में चांद पर पहुंचा था। यह नासा के J-टाइप मिशनों में पहला मिशन था। इसे पहले के मून मिशनों की तुलना में ज्यादा वैज्ञानिक काम के लिए तैयार किया गया था। इसमें कई वैज्ञानिक उपकरण थे और अंतरिक्ष यात्रियों को चांद की सतह पर ज्यादा दूर तक जाने की आजादी मिली थी। डेविड स्कॉट और जेम्स इरविन ने चांद की सतह पर कुल करीब 19 घंटे बिताए। उन्होंने लूनर रोविंग व्हीकल की मदद से एपेनाइन पहाड़ों और हैडली रिल के आसपास के इलाके में यात्रा की और पृथ्वी पर मौजूद वैज्ञानिकों के लिए चट्टानों और मिट्टी के नमूने इकट्ठा किए।इन्हीं यात्राओं में एक जगह उन्हें हरे रंग के छोटे-छोटे कण दिखाई दिए।

शुरुआत में जेम्स इरविन को भी यकीन नहीं हुआ कि वे सच में हरे रंग के कण हैं। लेकिन डेविड स्कॉट ने करीब से देखने के बाद इसकी पुष्टि की। ये छोटे हरे दाने बाद में अपोलो मिशन से वापस लाए गए सबसे दिलचस्प नमूनों में शामिल हो गए। अपोलो 15 मिशन करीब 170 पाउंड चंद्र सामग्री पृथ्वी पर वापस लाया था।

हरे रंग के ये दाने क्या थे?

ये किसी रंगीन पत्थर के साधारण टुकड़े नहीं थे। ये ज्वालामुखी से निकला कांच था। जब चांद के अंदर मौजूद पिघला हुआ पदार्थ ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान सतह के पास आया और बहुत तेजी से ठंडा हुआ, तो उसने कांच जैसे छोटे-छोटे दाने बना दिए।

इन दानों की खासियत यह थी कि वे चांद के अंदर से आए थे। सतह पर मौजूद चट्टानों के विपरीत, ज्वालामुखी का यह कांच उस पिघले हुए पदार्थ की कुछ मूल जानकारी अपने अंदर बचाकर रख सकता था, जिससे वह बना था।यही वजह थी कि वैज्ञानिकों के लिए ये छोटे दाने इतने महत्वपूर्ण थे। उनकी रासायनिक बनावट देखकर वैज्ञानिक चांद के उस हिस्से के बारे में जानकारी हासिल कर सकते थे, जहां से यह पिघला हुआ पदार्थ आया था।दाने छोटे थे, लेकिन उनमें चांद के पुराने ज्वालामुखी इतिहास और उसके अंदरूनी हिस्से की स्थिति के बारे में बड़े सुराग छिपे थे। फिर भी, कई दशकों तक वैज्ञानिकों की सामान्य धारणा यही रही कि चांद लगभग सूखा है।

Moon Water: चांद के अंदर पानी कहां से आया?

अपोलो मिशनों से मिले शुरुआती नमूनों ने भी चांद के सूखे होने की धारणा को मजबूत किया था। नासा के मुताबिक, उस समय चंद्र मिट्टी की जांच में पानी का कोई साफ सबूत नहीं मिला था। इससे वैज्ञानिकों ने मान लिया कि चांद की सतह बेहद सूखी है। चांद के अंदर काफी मात्रा में पानी होने की संभावना पर भी लंबे समय तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन जैसे-जैसे जांच की तकनीक बेहतर हुई, तस्वीर बदलने लगी।

साल 2008 में ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपोलो 15 और अपोलो 17 से मिले ज्वालामुखी कांच के दानों की दोबारा जांच की। भूविज्ञानी अल्बर्टो साल और उनकी टीम को इन छोटे दानों में हाइड्रोजन के संकेत मिले। यह खोज खास थी क्योंकि ये दाने चांद के अंदर गहराई से आए पिघले हुए पदार्थ से बने थे। इसका मतलब था कि जिस समय ये ज्वालामुखी कांच के दाने बने, उस समय चांद के अंदर पानी से जुड़ा पदार्थ मौजूद था। दूसरे शब्दों में, चांद के अंदरूनी हिस्से में पानी के कुछ निशान अरबों साल पहले से बचे हुए थे।

यह खोज क्यों अहम थी?

ब्राउन यूनिवर्सिटी के अनुसार, यह इस बात का मजबूत सबूत था कि चांद का अंदरूनी हिस्सा उतना सूखा नहीं था, जितना वैज्ञानिक लंबे समय से सोचते रहे थे। लेकिन इस खोज ने सिर्फ चांद पर पानी होने की बात नहीं बताई। इसने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—आखिर चांद के अंदर पानी बचा कैसे रहा? वैज्ञानिकों के मुताबिक, चांद के शुरुआती इतिहास में परिस्थितियां बेहद गर्म और हिंसक रही होंगी।

चांद की उत्पत्ति को लेकर सबसे प्रमुख विचार यह है कि शुरुआती पृथ्वी और किसी दूसरे ग्रह जैसे बड़े पिंड के बीच हुई एक जबरदस्त टक्कर से निकले मलबे से चांद बना। अगर ऐसा हुआ था, तो उस टक्कर के दौरान तापमान और ऊर्जा इतनी ज्यादा रही होगी कि पानी जैसे आसानी से उड़ने वाले पदार्थों के खत्म हो जाने की उम्मीद की जाती थी। लेकिन ज्वालामुखी कांच के इन छोटे-छोटे दानों ने एक अलग कहानी बताई।

उन्होंने संकेत दिया कि चांद के बनने और उसके शुरुआती बेहद गर्म दौर के बावजूद उसके अंदरूनी हिस्से में कुछ पानी बचा रह गया था। एक छोटे-से हरे कांच के दाने में छिपा यह सुराग इसलिए खास है, क्योंकि उसने चांद के बारे में हमारी समझ को सिर्फ उसकी सतह तक सीमित नहीं रखा। उसने वैज्ञानिकों को चांद के अंदर झांकने का एक तरीका दिया—उस पदार्थ के जरिए जो अरबों साल पहले उसके भीतर से बाहर आया था।

Advertisements

Editorial Desk
लेखक के बारे मेंEditorial Team

यह लेख हमारी विशेष संपादकीय टीम द्वारा तैयार किया गया है।

और पढ़ें
Share this post:
अगली खबर

Giant Isopod: संग्रहालय में मिला नई प्रजाति का विशाल जीव

editorial-desk
|

क्या किसी जीव की नई प्रजाति बिना समुद्र में उतरे भी खोजी जा सकती है? Puerto Rico से आए एक पुराने Giant Isopod के नमूने ने वैज्ञानिकों को इसका दिलचस्प जवाब दिया।

Puerto Rico से मिले 32.2 सेंटीमीटर लंबे Giant Isopod की नई प्रजाति Bathynomus tuebingoborikensis
अगली खबर

Global Glacier Extinction Explorer: ग्लेशियर कब खत्म होंगे?

editorial-desk
|

आज जो ग्लेशियर हजारों साल से पहाड़ों पर मौजूद हैं, क्या वे हमारी आंखों के सामने धीरे-धीरे गायब हो सकते हैं? एक नई इंटरैक्टिव वेबसाइट अब यह दिखाने की कोशिश करती है कि बढ़ते तापमान के साथ दुनिया के अलग-अलग ग्लेशियरों का भविष्य कैसा हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण सिकुड़ता हिमालयी ग्लेशियर और भविष्य में ग्लेशियर के संभावित नुकसान का दृश्य
Advertisements
अगली खबर

Chimpanzees और Bonobos तनाव में क्यों गले मिलते हैं?

dr-vikram-sharma
|

खाने की कमी सामने हो और पूरा समूह बेचैन हो जाए, तब ये जानवर क्या करते हैं? नए अध्ययन में मिला एक दिलचस्प संकेत—वे एक-दूसरे के और करीब आ सकते हैं।

Chimpanzees और bonobos एक-दूसरे को छूते और social bonding करते हुए
अगली खबर

Neutrino: क्या कभी प्रकाश से तेज दौड़े थे ये कण?

utkarsh
|

2011 में वैज्ञानिकों को लगा कि एक बेहद रहस्यमयी कण ने प्रकाश को पीछे छोड़ दिया है। कुछ महीनों बाद पता चला कि गलती कण में नहीं, वैज्ञानिकों के उपकरण में थी।

अंतरिक्ष से गुजरते न्यूट्रीनो कण और प्रकाश की गति की तुलना का वैज्ञानिक दृश्य